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पारदर्शी परीक्षा के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत-मुकेश कश्यप

 


 

बोले-राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के रूप में एनटीए अपनी विश्वसनीयता और परीक्षा की पवित्रता बनाए रखने में विफल रही है

 

 

कपूरथला 18 मई

ट्रिब्यून  टाइम्स  न्यूज :

 

भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षा केवल एक प्रतियोगिता नहीं,बल्कि लाखों परिवारों की आकांक्षाओं का केंद्र है।जब इस व्यवस्था में पेपर लीक जैसी सेंध लगती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं,बल्कि नैतिक और सामाजिक पतन का संकेत भी है।यह बात शिव सेना बाला साहिब ठाकरे शिंदे ग्रुप के पूर्व जिलाध्क्षय मुकेश कश्यप ने एक प्रेस बयान जारी कर कही।मुकेश कश्यप ने कहा कि नीट अराजकता से जुड़े विवादों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संकट कितना गहरा और व्यापक हो चुका है।पेपर लीक की समस्या अचानक उत्पन्न नहीं हुई,बल्कि यह वर्षों से बढ़ते संस्थागत क्षरण का परिणाम है।शिक्षा अब सेवा के बजाय एक विशाल उद्योग का रूप ले चुकी है।हजारों करोड़ रुपए के इस कारोबार में रिजल्ट ही सफलता का पैमाना बन गया है।कई कोचिंग संस्थान और बिचौलिए अपनी सफलता दर बढ़ाने के लिए अनैतिक रास्तों का सहारा लेते हैं।तकनीकी और लॉजिस्टिक कमियां भी इस समस्या को बढ़ाती हैं।परीक्षा केंद्रों का चयन,प्रश्नपत्रों की छपाई और उनका परिवहन अत्यंत संवेदनशील कडिय़ां हैं।मुकेश कश्यप ने कहा कि सुरक्षा प्रोटोकॉल में छोटी-सी मानवीय चूक या मिलीभगत भी पूरे सिस्टम को ध्वस्त कर देती है।अपराधी अब पारंपरिक तरीकों के बजाय एन्क्रिप्टेड ऐप्स जैसे टेलीग्राम और डार्क वेब का उपयोग कर रहे हैं,जिससे उन्हें पकडऩा और कठिन हो जाता है।कई मामलों में ऐसे गिरोहों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण भी प्राप्त होता है। त्वरित न्याय के अभाव में अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और वे बार-बार ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? बात अगर जवाबदेही के निर्धारण की करें तो इस संकट के लिए केवल एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है,बल्कि यह बहुस्तरीय विफलता का परिणाम है।मुकेश कश्यप ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के रूप में एनटीए अपनी विश्वसनीयता और परीक्षा की पवित्रता बनाए रखने में विफल रही है।डेटा विसंगतियों की अनदेखी और सुरक्षा ऑडिट में ढिलाई गंभीर प्रश्न खड़े करती है क्योंकि यह एनटीए की प्राथमिक जिम्मेदारी है।प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं में प्रिंटिंग प्रेस, परिवहन व्यवस्था और परीक्षा केंद्रों के कर्मचारियों की मिलीभगत होती है।बिना भीतरी मदद के इतने बड़े स्तर पर पेपर लीक होना संभव नहीं है।उन्होंने कहा शिक्षा में बढ़ते कोचिंग कल्चर पर प्रभावी नियंत्रण और मजबूत नियामक व्यवस्था का अभाव इस संकट को और गंभीर बनाता है।पेपर लीक की घटनाएं छात्रों और अभिभावकों के लिए केवल परीक्षा संबंधी समस्या नहीं,बल्कि गहरा मनोवैज्ञानिक आघात बन जाती हैं।जब पेपर लीक होता है तो सबसे अधिक कीमत वह छात्र चुकाता है,जो ईमानदारी से पढ़ाई कर रहा है।दो-तीन साल दिन रात मेहनत करने वाले छात्र खुद को जब इस अव्यवस्था में फंसा पाते हैं तो वे निराशा और अवसाद से ग्रस्त होने लगते हैं।सबसे बड़ा नुकसान योग्यता आधारित व्यवस्था को होता है।उन्होंने कहा कि ईमानदारी से मेहनत करने वाला छात्र पीछे रह जाता है,जब कि आर्थिक या अन्य अनुचित साधनों का उपयोग करने वाला डॉक्टर बनने की राह में आगे निकल जाता है।इससे समाज में योग्यता और न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होता है।उन्होंने कहा मध्यवर्गीय परिवार अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई और कोचिंग पर लगा देते हैं।परीक्षा रद्द होने या धांधली सामने आने पर उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार की क्षति उठानी पड़ती है।इस समस्या से निपटने के लिए केवल सतही सुधार पर्याप्त सर्जिकल स्ट्राइक की आवश्यकता है।

 

 

 

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